सदियों पहले ...
एक बसंत में...
मुस्कुराती ... प्रेम का पंख बनकर
आच्छादित हो गयी थी तुम
मुझपर...
अब सदियों के बाद ...
मेरे दिल की खिड़की से...
निकल कर ...
तुम ...
धुएं - धुएं सी मुस्कुराती हो
और आकाश के सूनेपन में कहीं ....
बहुत दूर दूर तक खो जाती हो...
मेरे दिल के मौसम के सूनेपन में
तुम्हारे याद ....
पतझड़ के पत्तों सी थरथराती है
और आहिस्ता आहिस्ता
सर्द मौसम की देहरी पर....
मेरी आँखों में ....
बरसात की झड़ी सी लग जाती है
मेरा संसार ...
अब वो नहीं.....
जहाँ सतरंगी सूरज की किरण थी
तुम्हारीं याद में हो गया
यहाँ का मौसम धुआं धुआं ...
मुझे अब भी याद है ....
कैसे तुम ......
बुरांस* का ...........
चटक लाल फूल बन
मुस्कुराती लजाती थी ....
और में खो जाता था ....
तुम्हारी सुरमई आँखों में ...
पर अब.....
वो नेह शेष नहीं रहा ......
भरा है मेरा आकाश
अनंत सूनेपन से ...,,,
न वो चाँद न तारे ,
और न मैं ही ....
कुछ शेष रहा ...
........श्रीप्रकाश डिमरी ...१५ मार्च २०१०
10 comments:
हृदय स्पर्शक रचनाओं एवं प्रेरणाओ के लिए हार्दिक आभार एवं शुभकामनाएँ...कुछ रचनाओं पर ही समय दे पाया ....दिल भर आया....
बहुत प्यारी रचना है....
सादर धन्यवाद वीणा जी ...!!!
आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 01-09 - 2011 को यहाँ भी है
...नयी पुरानी हलचल में आज ... दो पग तेरे , दो पग मेरे
भरा है मेरा आकाश
अनंत सूनेपन से ...,,,
न वो चाँद न तारे ,
और न मैं ही ....
कुछ शेष रहा ...
सुन्दर अभिव्यक्ति...
सादर बधाई...
बहुत ही बढ़िया सर।
सादर
भरा है मेरा आकाश
अनंत सूनेपन से ...,,,
न वो चाँद न तारे ,
और न मैं ही ....
कुछ शेष रहा .
yadon ki gahatayi me doobi hui sunder rachna ...badhai..
सभी आदरणीय मित्रों का हार्दिक अभिनन्दन !! गणेश चतुर्थी पर हार्दिक शुभ्ह कामनाएं !!!
khubsurat rachna...
बहुत सुन्दर रचना भैया .... बड़ा कोमल रूप है कविता में यादों का... सादर
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