Thursday, April 22, 2010

सिन्दूरी शाम






सिंदूरी  शाम ........
उस निश्तब्ध.....
अंधकार में......
पलाश वृक्षों तले
फुसफुसाते हुए..........
अपनी जादुई आवाज़ में
तुमने मुझसे पूछा था........
में कौन हूँ ?
निरुत्तर में..........
मेरा अस्तित्व भी ..........
सिर्फ एक मंथर गति...........
जीवन का सर्वनाम ...
कदापि नहीं है ........
क्यूंकि ...........
मुझे समेटना है ............
उस आभा को ...........
और तय करना है
एक सफ़र .....
अविराम .......
जीवन की सार्थकता का ....
उस सिंदूरी शाम तक .....
स्वरचित .... श्रीप्रकाश डिमरी.1983.

11 comments:

डॉ. नूतन गैरोला " अमृता " said...

bahut sundar rachnaa hriday ko sparsh karti huvi..

हरि जोशी said...

अति सुंदर ब्‍लाग और भावपूर्ण रचना....जय हो आपकी

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली ।
भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुंदर शैली ....बेहतरीन अभिव्यक्ति .....

Sushil Chandra Pandey said...

Sadar charan isparsh sir,.....
sach apne is pyari kavita ko kitne advut sabdon se piroya hai... har sabd ka apna mehtwa hai.. sandhya kalin bela par vagwan narayan apni kirno ko samet lete hai.. ek nayi suboh ke liye... qki prakash ka mehtwa tav hai jab andhera hai.. santulan sansar ka niyam hai.. is prakar dukh or sukh dono ka mehtwa barabar hai.. sach sir chand sabdon mai apne kitna kuch samjha diya.. apko koti koti naman.. apki har kavita hame kuch na kuch sikhati hai sir

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरती से भावों को समेटा है ..

वन्दना said...

बेहद गहन अभिव्यक्ति दिल मे उतर गयी।

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर रचना..शब्दों और भावों का बहुत सुन्दर संयोजन..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

Barthwal Pratibimba said...

सुंदर भाव शब्द अस्तित्व को ढूंढते परिभाषित करते हुये

अनुपमा पाठक said...

सुन्दर!