सिंदूरी शाम ........
उस निश्तब्ध.....
अंधकार में......
पलाश वृक्षों तले
फुसफुसाते हुए..........
अपनी जादुई आवाज़ में
तुमने मुझसे पूछा था........
में कौन हूँ ?
निरुत्तर में..........
मेरा अस्तित्व भी ..........
सिर्फ एक मंथर गति...........
जीवन का सर्वनाम ...
कदापि नहीं है ........
क्यूंकि ...........
मुझे समेटना है ............
उस आभा को ...........
और तय करना है
एक सफ़र .....
अविराम .......
जीवन की सार्थकता का ....
उस सिंदूरी शाम तक .....
स्वरचित .... श्रीप्रकाश डिमरी.1983.






