Saturday, October 1, 2011

मेरी वसुंधरा ....!!!

Earth

प्रिये !!
तुम्हारे मुझसे
रूठ जाने के बाद
सूने अनंताकाश में
तकता हूँ
सांझ के
उस झिलमिल तारे को
जो चाँद की इन्तजार में
जार जार रोते ..
कब का सो चूका है
तुम जहाँ....
सांझ का दीप जलाती थी
वहाँ खड़ा...
मुंह बाए मौन ओसारा
वहीँ ....
मिटटी में दबे आलता लगे...
तुम्हारे
कदमो के निशान
वहीँ ..
खेतों की  मेंढ पर ..
तुम्हारी
पायल सी हंसी
ओर...
सरसों के पीले फ़ूलों सा
तुम्हारा...
लकदक लहराता आँचल
साँझ सबेरे ...
अब भी
पुकारते हैं तुम्हारा नाम

तुम ही...
हाँ तुम ही ...
निहारिकाओं की ...
सुन्दरतम नारी…..
असंख्यों स्मृतियाँ हैं
मेरी ओर तुम्हारी
आह ! प्रिये !
अवसान की इस नीरव बेला पर

तुम मुझसे क्यों रूठ गयीं ???
लिये पुष्पों के इन्द्रधनुषी हार
क्यों नहीं आई तुम..???
मेरे
ह्रदय द्वार ..
...................................

डबडबाई आँखों

और
डूबते दिल से
तुमसे पूछता हूँ ..


कि सदियों बाद ..
जब में लौट कर..आऊंगा
अँधेरे पहाड़ों की..
उसी घाटी से ..

जहां तुम्हारे और मेरे ..
नेह की उषा का
पहला पहला..
नारंगी सूरज खिला था...
अपनी तुतलाती आवाज में..
फिर पुकारूँगा तुम्हारा नाम !!!

तो क्या तब ..
तुम दिखाओगी मुझे ..??
वही ...................
कोयल की अदना सी...
कूक से भरा
मुट्ठी भर जंगल
हथेली भर.....
सरसों के
मुस्कुराते पीले फूल
बच्चों की ...
छेड छाड से
घूंघट में शर्माती
लाजवंती की
स्निग्ध मुस्कान

मेरी वसुन्धरे ...!!!
जड़वत यूँ ....
क्यों निशब्द तुम खड़ी हो ??
अपने मधुरिम अधरों का *..

अब तो खोलो मौन ??
*आह !!!
आकाश गंगा के ...
नीरव तट पर
इसका उत्तर देगा कौन ???





श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ २५ सितम्बर २०११
कभी कभी  अपने  आपको जीवन  रूप  में   अस्तित्व  में आने  की  जिजीविषा  में   आकाश गंगाओं  में  लाखों प्रकाश  वर्ष  दूर ..संघर्ष रत   पाता हूँ .स्वयं  जीव  रूप  में जहाँ तक  नजर  जाती  है जीवन के  लिये  अनुकूल परिस्थितयां  प्रदान  करने  वाली   दयामयी  
हमारी पृथ्वी  निहारिकाओं  में   सबसे  सुन्दर  है ..इसको  ऐसे  ही शास्वत  सुन्दर  बनाये  रखें ..हम..
फोटो साभार गूगल 

40 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

रहे उत्तर की प्रतीक्षा।

रविकर said...

तुम्हारे
कदमो के निशान
वहीँ ..
खेतों की मेंढ पर ..
तुम्हारी
पायल सी हंसी
ओर...
सरसों के पीले फ़ूलों सा
तुम्हारा...
लकदक लहराता आँचल
साँझ सबेरे ...
अब भी
पुकारते हैं तुम्हारा नाम


बढ़िया प्रस्तुति ||

बहुत-बहुत बधाई ||

कविता रावत said...

कि सदियों बाद ..
जब में लौट कर..आऊंगा
अँधेरे पहाड़ों की..
उसी घाटी से ..
जहां तुम्हारे और मेरे ..
नेह की उषा का
पहला पहला..
नारंगी सूरज खिला था...
..sundar tasveer ke saath samanjsya bithati rachna vimbon ke nutan prayog se prerak rachna ban padi hai..
sundar rachna aur Navratri kee aapki spariwar haardik shubhkamna..

sushma 'आहुति' said...

bhaut hi khubsurat aur sarthak rachna....

Kunwar Kusumesh said...

गजब की अभिव्यक्ति

kshama said...

Badee hee bhavuk rachana hai!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

बहुत सुंदर शाब्दिक अलंकरण..... बेहतरीन चित्रण ....

अनुपमा पाठक said...

मौन में ही उत्तर निहित हो शायद....!
बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति!

रश्मि प्रभा... said...

डबडबाई आँखों
और
डूबते दिल से
तुमसे पूछता हूँ ..

कि सदियों बाद ..
जब में लौट कर..आऊंगा
अँधेरे पहाड़ों की..
उसी घाटी से ..
जहां तुम्हारे और मेरे ..
नेह की उषा का
पहला पहला..
नारंगी सूरज खिला था...
अपनी तुतलाती आवाज में..
फिर पुकारूँगा तुम्हारा नाम !!!
तो क्या तब ..
तुम दिखाओगी मुझे ..?? bahut khoob

पी.एस .भाकुनी said...

आपको भी स:परिवार विजय दशमी की हार्दिक शुभकानाएं प्रेषित करता हूँ , और उपरोक्त भावमय प्रस्तुति हेतु आभार........

Bhushan said...

विरह है तो आशा भी है. सुंदर.

Dr Varsha Singh said...

गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ ज़बरदस्त प्रस्तुति!

विजयादशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं।

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

Bhavpurn kavya lekhan.

Babli said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
आपको एवं आपके परिवार को दशहरे की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

अरुण चन्द्र रॉय said...

श्री भाई सम्भावना से भरी हैं आपकी कवितायेँ ..सुन्दर

Maheshwari kaneri said...

सुन्दर अनुभूति ,गहन भाव..खूबसूरत चित्र...

dabral said...

very nice ................ moving need congrats ......

chirag said...

bahut khoob
nice blog

शेफाली पाण्डे said...

blog par aane ka dhanyvaad....

सतीश सक्सेना said...

एक प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए बधाई !

shikha varshney said...

सुन्दर और प्रभावी रचना.

मदन शर्मा said...

मैंने आने में जरा देर कर दी इसके लिए माफ़ी चाहूँगा.
बहुत बढ़िया लिखा है आपने! हार्दिक शुभकामनायें !

रश्मि प्रभा... said...

तुम जहाँ....
सांझ का दीप जलाती थी
वहाँ खड़ा...
मुंह बाए मौन ओसारा
वहीँ ....
मिटटी में दबे आलता लगे...
vasundhra ke liye sahi aahwaan kiya hai, drishya prashn ban nihshabd khade hain

Rajesh Kumari said...

bahut sundar shreshth prastuti.

ASHA BISHT said...

BHAVPURN RACHNA....

ana said...

bahut sundar shabdon ka chayan....umda prastuti

NISHA MAHARANA said...

लाजवाब प्रस्तुती!

मदन शर्मा said...

बहुत सुन्दर रचना|
आपको तथा आपके परिवार को दिवाली की शुभ कामनाएं!!!

ana said...

shabo ko bejod tarike se sajaya hai apne....umda prastuti

आशा जोगळेकर said...

कोयल की अदना सी कूक से भरा जंगल हथेली पर और मुठ्ठी भर सरसों के फूल ।

यही तो है हमारी वसुंधरा का सौंदर्य, उसका वैभव ।

आशा जोगळेकर said...

खूबसूरत रचना के लिये बधाई ।

Minakshi Pant said...

बहुत खूबसूरत भावनात्मक रचना |

मनीष कुमार ‘नीलू’ said...

दिल में उतरती एक बेहद भावपूर्ण रचना
मेरे ब्लॉग पे आपका स्वागत है ..

Rakesh Kumar said...

कमाल की प्रस्तुति है आपकी.
मार्मिक और भावविभोर करती हुई.
आभार.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

हरकीरत ' हीर' said...

तुम जहां
तुमझ का दीप जलती थी
वहाँ खड़ा
मुंह बाये मौन असारा ....

उफ्फ्फ....
अवसान की इस नीरव बेला पर ....
बेहद संवेदनशील रचना .....
और दर्द भरी भी .....
उआ है ये नारंगी सूरज यूँ ही खिला रहे .....

हरकीरत ' हीर' said...

उआ को 'दुआ' पढें ....

डॉ. जेन्नी शबनम said...

behad bhaavpurn...

प्रेम सरोवर said...

आपका पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका आमंत्रण है । ।धन्यवाद ।

dheerendra said...

श्री प्रकाश जी,
आपने बहुत ही सुंदर सरल सादगी भरे शब्दों से रची ख़ूबसूरत रचना मुझे पसंद आई,..बेहतरीन पोस्ट...
मेरे नए पोस्ट -वजूद- में स्वागत है...

Reena Maurya said...

bahut sundar lajawab prasuti...