Friday, October 5, 2012

वो सुबह ...!!!




 मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
 हरी दूब में....
 मेरी स्वछंद किलकारियां
उनकी आँखों में स्वप्नों  के असंख्य 
महासागर  बुनती थी ..
और रात गए माँ के आँचल में ..

लुका  छिपी करती  

मेरी  निंदिया
 मुस्कुराती  माँ  की   बिंदिया...  ...
मेरे माथे  को सहलाती...
 माँ की   अंगुलियां.........
बहुत सुहाती थी ..
थके कंधे पर ..
अब भी  महसूस होता है..
 बचपन को  बेगार   करते ..
उस भारी बस्ते का  बोझ..

और विश्वास में  उनके...  

तब तक..हिलते 
दो जोड़ी हाथ..
जब तक  मेरी भोली आस्थाएं ..
स्कूल की  सीडियां
 न  लांघ  जाती थी ..
उन सीडियों  से ...
 इस ड्योढ़ी  तक ...

पहुँचते पहुँचते.......

 मेरा अस्तित्व
मेरी ज्ञानेन्द्रियों के .
 अथक  प्रयत्न के बाद भी
 ब्यवस्थाओं की बैसाखी  थामे
 तुम्हारे  अस्तित्व से कोसो दूर है ... 
अब थके हारे मेरे .. 
सारे युवा स्वप्नों के भग्नावेश
पिता के पीले उदास   चेहरे  की...
 झुर्रियों में  अंकित हो गए हैं ..
विकास  के इस क्रम  में ???
वो दिन के बुढाए ..
 शाम  का सूरज से  हो गए हैं  ..
आस्थाओं की  डोर ...
 भरभरा कर  टूट गयी  है ....
उनकी स्याह   आँखों... से ...
 बहता है निरंतर...

 एक विवश आक्रोश ...

अब नहीं बुनती  हैं वो 
सपनो के  सुनहरे तार ..

सोचता हूँ क्या ढूँढ सकूंगा ??

उनकी  आँखों  में विलुप्त ...
उन असंख्य  महासागरों को ..

क्योंकि...

मुझे  अब भी याद है....

बचपन कि वो सुबह.....

जब पिता के साथ......



श्रीप्रकाश  डिमरी  देहरादून  उत्तराखंड  १९८४
मेरी  डायरी के अंश  

16 comments:

Barthwal Pratibimba said...

आपने यादों के सुनहरे संसार मे पहुंचा दिया .... अति सुंदर श्री जी

Barthwal Pratibimba said...

आपने यादों के सुनहरे संसार मे पहुंचा दिया .... अति सुंदर श्री जी

Balkrishna Dhyani said...

धन्यवाद समर्थ गुरुवर आपका मै क्या बोलों अतुलनीय मेरे लिये

Balkrishna Dhyani said...

आपका मै क्या बोलों अतुलनीय मेरे लिये

Balkrishna Dhyani said...

धन्यवाद आप का समर्थ गुरुवर आपका मै क्या बोलों अतुलनीय मेरे लिये

अल्पना वर्मा said...

यादों के झरोखे से बीते कल को जी लेना कितना सुखद होता है ..वर्तमान के कोलाहल से दूर..

..सपने टूटते हैं तो फिर बनते भी जाते हैं..उनकी विवशता उन्हें हराती नहीं होगी बल्कि वे उम्मीद के सहारे संबल पाते भी होंगे .

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

स्मृतियाँ जीवन से जुड़ी.... मर्मस्पर्शी

सदा said...

यादों का अनमोल खजाना खोलते शब्‍द ...

वन्दना said...

बेहद मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

sushma 'आहुति' said...

मार्मिक भावाभिवय्क्ति.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय said...

यही स्मृतियाँ जीवन भर थपकाती हैं।

रचना दीक्षित said...

स्मृतियाँ भी विस्मित कर जाती हैं. उम्दा प्रस्तुति.

Rakesh Kumar said...

बहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी प्रस्तुति हैं.
जीवन में बचपन के बीते पल बहुत अनमोल होते हैं.

पी.एस .भाकुनी said...

किसी शायर की जुबानी-हमने जहाँ भी यादों की तस्वीर टांग दी,
परिंदों ने आस-पास वही घर बना लिए .........मार्मिक भावाभिवय्क्ति.....

Archana said...

प्रभावशाली कविता. बधाई.