Tuesday, November 5, 2013

भूल.............!!



पता नहीं क्यों  ??
हर बार
तुम्हारे अहसान को नेह  समझकर
मैं भरमा जाता हूँ
और निश्चल पेम की तलाश में
रास्ता भूल कर 
तुम तक
भूला   भटका आ जाता हूँ
................................................................
पर हर बार ...
तुम मुझे छल  लेते   हो
अहसानों के हिसाब किताब की
पोटली  खोल कर
वीरान बसंत  की
उदास  खायी में धकेल देते   हो

.....................................
पर

ऐसा करके  क्यों तुन ??
आत्म सम्मोहन में
विस्मृत कर देते   हो ...
परमात्मा की   निश्चल मुस्कान
जो देख रहा है ....
और अहम्  ब्रह्मास्मि
समझने की तुम्हारी भूल  को
तौल  रहा  है ....
.......................................................
मेरा  मिटटी का इक नन्हा घर
जो उगा था ....
उस पगलाती  नदी किनारे

उसमे  मैं कब का डूब चुका हूँ
और  तुम
मुझे मलबे में भी  
जीवित
समझने  में  मशगूल  रहते हो ......
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यूँ तो
घोर निराशाओं  के  सैलाब  में  डूबते
मेरे मन आँगन में नहीं बची है  
सुनहरे बालों  वाले गुड्डे  गुडिया
चन्दा मामा और परियों  की कहानियाँ...
......................................................
पर क्यों कर तुम्हारे  आँगन मे
उग आयी है
अनंत  विलुप्ति
जिसे तुम 
नेह की तुलसी समझते    हो
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मैं जानता हूँ  कि शाम ढल चुकी  है
जहां  हाथ को हाथ नहीं सूझता
ऐसे घुप्प अन्धकार  में
नाव ढूँढना  बेमानी  है
फिर भी पता नहीं क्यों
……………………………………………….
इतिहास के पन्नो  को भूलकर
निश्चल पेम की तलाश में
हर बार मैं  रास्ता  भूल कर
तुम तक आ जाता हूँ.........
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बहुत दिनों बाद आना  हो पाया ..इस बीच  काफी  गंभीर  कष्ट कारी समस्याओं से दो चार होना पड़ा ....बहुत कुछ  सीख और समझ पाया ...सच्चे मित्रों और  सतही रिश्तों  का भेद भी खुला ..सही मायने में कुछ ऐसे  चेहरे भी  अनावृत हुए जिनपर  संवेदनाओं की बाहरी  परत लिपटी होती है पर भीतर से एकदम पाषाण ... पता नहीं  जितने  दर्द  में मन डूबा होता है उतने का कितना अंश हम उकेर पाते हैं फिर भी लिखने का अदना प्रयास.... डूबते मन की थाह  की तलाश जारी है ...शब्दों की  सीमा मे बंध कर.......
श्रीप्रकाश डिमरी जुलाई १० /२०१३ 

फोटो साभार  गूगल 

8 comments:

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

प्रवीण पाण्डेय said...

हर बार एक रेख मुझे खींच लेती है, पुराने दिग्भ्रम भुला कर।

Digamber Naswa said...

कुछ खास पलों में ही जीवन का सही दर्शन हो पाता है ... अपने पराये का भेड़ हो पाता है ... ह्रदय स्पर्शीय है आपकी रचना ...

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ,यह भी जीवन का एक पहलू है |
नई पोस्ट फूलों की रंगोली
नई पोस्ट आओ हम दीवाली मनाएं!

sushma 'आहुति' said...

भावो का सुन्दर समायोजन......

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
नवरात्र की शुभकामनाएं!

कहकशां खान said...

एक उत्‍कृष्‍ठ प्रस्‍तुति।