.अपने आस पास मानवीय संवेदनाओं ..आस्थाओं के सरल ओर सहज रूप को ..अविश्वाश ओर दंभ से परास्त होते देखना कितना पीड़ा दायक होता है ... हमारी संवेदनाये ओर स्नेह इस भौतिक युग में सभ्यता के तथाकथित विकास में .. कितना बिखर चुके हैं ....मन भर आता है..ओर अनुभूतियाँ स्पन्दित होने लगती हैं.. .. अवाक रह जाता हूँ मैं....फिर भी विश्वास है .. संसार में मानवीय संवेदनाएं एवं पारस्परिक प्रेम की भावना के जीवंत होने का....
Sunday, August 21, 2011
Monday, July 18, 2011
प्रेम.....
प्रेम !!!..............
रात गए ...
तन्हाईयों में अक्सर ..
एक चहचाहट सी सुनकर
उठ जाता हूँ विस्मित होकर ..
उस घटाटोप अंधकार में भी
तुम्हारी प्रेम पाती मुस्कुराती है ..
और मेरे ह्रदय के नीड़ से उडकर
तुम्हारी भेजी दो नन्ही चिडियाँ ...
मन आंगन के अंधेरों में
आशाओं के असंख्य ...
मधुर गीत सुनाती है ..
तब .....
अपने तमाम नेह को
कागज में उडेलने के
अथक प्रयास में ....
मेरी आँखों में युगों से कैद
एक हठीले ....
निश्तब्ध महासागर का मौन
एकाएक टूट जाता है ..
और निर्झर बहते अश्रुओं में
तुम्हारा ही " प्रतिबिम्ब" मुस्कुराता है ...
....................................
( परम स्नेही मित्र प्रतिबिम्ब बर्थवाल जी के स्नेह को समर्पित )
स्वरचित..... श्रीप्रकाश डिमरी २३ मई २०१०
Wednesday, July 6, 2011
Tuesday, June 28, 2011
(१) सुनो शिशिर..... !!!!
Saturday, April 23, 2011
सुनो शिशिर..... !!!!

सुनो शिशिर..... !!!!
हिम कँवर ...
जब तुम बरसाते
कम्पित विहग ..
कहाँ चले जाते ..!!!???
सुख की डोली में
मगन तुम झूलो
शिशुपन के पुलकित मन का
कैसा नीरव.....!!!!
ये सृजन ???
आह सखी ...
भर लायी हूँ मैं....!!
नैनो में उनका करुण रुदन ..
हिम कँवर ...
जब तुम बरसाते ..
कहो शिशिर ..!!!???
कम्पित विहग ...!!!
कहाँ चले जाते ...????
****क्रमशः*****
श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ, जनवरी २०११
Tuesday, March 22, 2011
मैं अब न लौटूंगा...!!!
आह !!!
प्रिये !!!
दृगों में लिपटे
तुम नन्हे फूल से
कहा रहे भटके ????
तुम मुझे भूल के ???
अब भुला ही देना ....
नहीं बुलाना मुझको
मैं अब न लौटूंगा ????
पर आज क्यों मैं ..!!!!
सशंकित हो उठा हूँ
क्या तुम खो जाओगे ???
असहाय होकर
मुझे क्या
उस पार ...
जाता हुआ...
देख पाओगे ???
या रुदन में
आसुंओं के बीच
दृग में मुझे पाओगे .. ????
शांत रहना तुम ..
किंचित ना रोना
धरा पर झर रहे पुष्पों से
यूँ ब्यथित ना होना ....!!!
काट लेना इस विपद को
मित्र तुम धीर से ...
मैं चला उस पार ....
शरद की पीर से
तुम करना प्यार ..
उस शेष से
जो कल फिर ...
क्षितिज के ….
उस पार से
बसंत बन मुस्काएगा ....
अंक में भर कर तुम्हे ...
मेरे स्वरों में
विरह गीत सुनाएगा... ..
श्रीप्रकाश डिमरी
जोशीमठ १६-३-२०११


