Saturday, October 20, 2012

जीवन पथ ....

देहरादून/ दून घाटी  मुसूरी  मार्ग से मेरे द्वारा  खींची गयी  तस्वीर 



मुक्ति मार्ग की  इस उलझन में 
क्षणभंगुर  यौवन  घर में
बंजारे  का कौन ठिकाना
दूर बहुत है  मुझको जाना,,,,,,

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खेल खिलौने  मीत सलोने 
रूठे पल छिन  सावन झूले

सागर मे भरी सीपें जितनी

भूली बिसरी यादे  कितनी ??
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तारों भरी वो रात सुहानी
ना जाने फिर कब हैं  आनी..
आँख   से बहता  झरझर  पानी
  गुजर गयी कब  रात सुहानी    ??
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जन्म  मृत्यु अंतहीन कहानी  
सृष्टि चक्र  की  बात पुरानी
आँखों मे जी भरकर  भरलूं
प्रियतम  तेरी  छवि  सुहानी  !!
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शास्वत चलते  काल चक्र में 
थके पथिक  का   क्या भरमाना

अंतर्मन  का सूर्य अस्त  हो 
  कल जाने  फिर कब हो आना ??
दूर बहुत है मुझको जाना ....
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श्रीप्रकाश डिमरी  जोशीमठ  उत्तराखंड भारत 
१८  अक्टूबर  २०१२  फोटो साभार  गूगल....



Friday, October 5, 2012

वो सुबह ...!!!




 मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
 हरी दूब में....
 मेरी स्वछंद किलकारियां
उनकी आँखों में स्वप्नों  के असंख्य 
महासागर  बुनती थी ..
और रात गए माँ के आँचल में ..

लुका  छिपी करती  

मेरी  निंदिया
 मुस्कुराती  माँ  की   बिंदिया...  ...
मेरे माथे  को सहलाती...
 माँ की   अंगुलियां.........
बहुत सुहाती थी ..
थके कंधे पर ..
अब भी  महसूस होता है..
 बचपन को  बेगार   करते ..
उस भारी बस्ते का  बोझ..

और विश्वास में  उनके...  

तब तक..हिलते 
दो जोड़ी हाथ..
जब तक  मेरी भोली आस्थाएं ..
स्कूल की  सीडियां
 न  लांघ  जाती थी ..
उन सीडियों  से ...
 इस ड्योढ़ी  तक ...

पहुँचते पहुँचते.......

 मेरा अस्तित्व
मेरी ज्ञानेन्द्रियों के .
 अथक  प्रयत्न के बाद भी
 ब्यवस्थाओं की बैसाखी  थामे
 तुम्हारे  अस्तित्व से कोसो दूर है ... 
अब थके हारे मेरे .. 
सारे युवा स्वप्नों के भग्नावेश
पिता के पीले उदास   चेहरे  की...
 झुर्रियों में  अंकित हो गए हैं ..
विकास  के इस क्रम  में ???
वो दिन के बुढाए ..
 शाम  का सूरज से  हो गए हैं  ..
आस्थाओं की  डोर ...
 भरभरा कर  टूट गयी  है ....
उनकी स्याह   आँखों... से ...
 बहता है निरंतर...

 एक विवश आक्रोश ...

अब नहीं बुनती  हैं वो 
सपनो के  सुनहरे तार ..

सोचता हूँ क्या ढूँढ सकूंगा ??

उनकी  आँखों  में विलुप्त ...
उन असंख्य  महासागरों को ..

क्योंकि...

मुझे  अब भी याद है....

बचपन कि वो सुबह.....

जब पिता के साथ......



श्रीप्रकाश  डिमरी  देहरादून  उत्तराखंड  १९८४
मेरी  डायरी के अंश