Sunday, February 1, 2015

गुमसुम चांदनी

यकीं  है
ये  आगाज है 
अंजाम  नहीं
कारवाँ
नहीं थमेगा अभी
कई मंजिलें
और भी हैं
राहे गुजर में
................
जिंदगी के आईने में
कर लेंगे हिसाब किताब
पलकों पे ठिटके   
उन आंसुओं का
 ................... 
यकीं ही नहीं होता  
कि पत्थरों के इस  शहर में
मसीहा  कोई
तुमसा भी मिले  
......................................
अपने रंजो गम को
तारीख बनाने वालों
काश कल रात को
मर  गए  चाँद के कफ़न को
तुमने  देखा होता
........................................
गुजारिश  है तुझसे
खामोश हो जा
ऐ चांदनी…….
यहाँ  की
दस्तूरे  जिंदगी  में
सिसकना  मना  है ......

श्रीप्रकाश डिमरी १७ सितम्बर २०१४ 


Tuesday, November 5, 2013

भूल.............!!



पता नहीं क्यों  ??
हर बार
तुम्हारे अहसान को नेह  समझकर
मैं भरमा जाता हूँ
और निश्चल पेम की तलाश में
रास्ता भूल कर 
तुम तक
भूला   भटका आ जाता हूँ
................................................................
पर हर बार ...
तुम मुझे छल  लेते   हो
अहसानों के हिसाब किताब की
पोटली  खोल कर
वीरान बसंत  की
उदास  खायी में धकेल देते   हो

.....................................
पर

ऐसा करके  क्यों तुन ??
आत्म सम्मोहन में
विस्मृत कर देते   हो ...
परमात्मा की   निश्चल मुस्कान
जो देख रहा है ....
और अहम्  ब्रह्मास्मि
समझने की तुम्हारी भूल  को
तौल  रहा  है ....
.......................................................
मेरा  मिटटी का इक नन्हा घर
जो उगा था ....
उस पगलाती  नदी किनारे

उसमे  मैं कब का डूब चुका हूँ
और  तुम
मुझे मलबे में भी  
जीवित
समझने  में  मशगूल  रहते हो ......
........................................................................
यूँ तो
घोर निराशाओं  के  सैलाब  में  डूबते
मेरे मन आँगन में नहीं बची है  
सुनहरे बालों  वाले गुड्डे  गुडिया
चन्दा मामा और परियों  की कहानियाँ...
......................................................
पर क्यों कर तुम्हारे  आँगन मे
उग आयी है
अनंत  विलुप्ति
जिसे तुम 
नेह की तुलसी समझते    हो
..............................................
मैं जानता हूँ  कि शाम ढल चुकी  है
जहां  हाथ को हाथ नहीं सूझता
ऐसे घुप्प अन्धकार  में
नाव ढूँढना  बेमानी  है
फिर भी पता नहीं क्यों
……………………………………………….
इतिहास के पन्नो  को भूलकर
निश्चल पेम की तलाश में
हर बार मैं  रास्ता  भूल कर
तुम तक आ जाता हूँ.........
.........................................................


बहुत दिनों बाद आना  हो पाया ..इस बीच  काफी  गंभीर  कष्ट कारी समस्याओं से दो चार होना पड़ा ....बहुत कुछ  सीख और समझ पाया ...सच्चे मित्रों और  सतही रिश्तों  का भेद भी खुला ..सही मायने में कुछ ऐसे  चेहरे भी  अनावृत हुए जिनपर  संवेदनाओं की बाहरी  परत लिपटी होती है पर भीतर से एकदम पाषाण ... पता नहीं  जितने  दर्द  में मन डूबा होता है उतने का कितना अंश हम उकेर पाते हैं फिर भी लिखने का अदना प्रयास.... डूबते मन की थाह  की तलाश जारी है ...शब्दों की  सीमा मे बंध कर.......
श्रीप्रकाश डिमरी जुलाई १० /२०१३ 

फोटो साभार  गूगल 

Thursday, November 1, 2012

जागो रे ....!!!




इस घने अँधेरे में
अपने रोम रोम से

पुकारता हूँ....
 अपने ही आप को

सकल ज्ञानेन्द्रियों को
जाग्रत करने पर भी
उतना नहीं भाग सकता हूँ

जितना सरपट...
 तुम भागते हो


खैरात की...
 बैसाखियों के सहारे

और लांघ जाते हो
कुहासे के उस  पार
जहाँ छद्म जिजीविषा का
सतरंगी सूरज

अभिनन्दन करता है....
 तुम्हारा

और तुम ..
विजयी मुस्कान से
आसीन हो जाते  हो
पक्षपात के सिहांसन पर
जिसे

सामाजिक न्याय का..
 नाम देकर

कुछ लुटेरे सेंकते हैं
प्रजातंत्र के  अलाव में

वोटों की 
आढ़ी तिरछी  रोटियां


 मेरा सारा आक्रोश...
 कैद हो जाता है

बंद बाजुओं में

और...
 ब्यवस्था परिवर्तन  के नाम पर ....


छद्म  नारों  की..
 तुम्हारी खर  पतवार 
उगाती है   
एक खोखली  पराजित मुस्कान


मेरे विवश अंतस में...
अंकुरित हो रहा है 

एक  क्रांति पल्लव ओर 
धीरे धीरे ..
टुकड़ों में बंट रही  है आस्था

 तुम हो कि  सोये हो
भेदभाव पूर्ण भ्रम के..
 उस कुम्भकर्णी जाल में

जहाँ धीरे धीरे सरक रही है 

एक मकड़ी ...
 तुम्हे  लीलने को .......

श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ सितम्बर ५, २०१२
फोटो साभार  गूगल 

Saturday, October 20, 2012

जीवन पथ ....

देहरादून/ दून घाटी  मुसूरी  मार्ग से मेरे द्वारा  खींची गयी  तस्वीर 



मुक्ति मार्ग की  इस उलझन में 
क्षणभंगुर  यौवन  घर में
बंजारे  का कौन ठिकाना
दूर बहुत है  मुझको जाना,,,,,,

........................................
खेल खिलौने  मीत सलोने 
रूठे पल छिन  सावन झूले

सागर मे भरी सीपें जितनी

भूली बिसरी यादे  कितनी ??
........................................

तारों भरी वो रात सुहानी
ना जाने फिर कब हैं  आनी..
आँख   से बहता  झरझर  पानी
  गुजर गयी कब  रात सुहानी    ??
..................................................

जन्म  मृत्यु अंतहीन कहानी  
सृष्टि चक्र  की  बात पुरानी
आँखों मे जी भरकर  भरलूं
प्रियतम  तेरी  छवि  सुहानी  !!
......................................................

शास्वत चलते  काल चक्र में 
थके पथिक  का   क्या भरमाना

अंतर्मन  का सूर्य अस्त  हो 
  कल जाने  फिर कब हो आना ??
दूर बहुत है मुझको जाना ....
......................................................

श्रीप्रकाश डिमरी  जोशीमठ  उत्तराखंड भारत 
१८  अक्टूबर  २०१२  फोटो साभार  गूगल....



Friday, October 5, 2012

वो सुबह ...!!!




 मुझे अब भी  याद है
बचपन की  वो सुबह ...
जब  ऑफिस जाने से पहले...
पिता के साथ ...
 हरी दूब में....
 मेरी स्वछंद किलकारियां
उनकी आँखों में स्वप्नों  के असंख्य 
महासागर  बुनती थी ..
और रात गए माँ के आँचल में ..

लुका  छिपी करती  

मेरी  निंदिया
 मुस्कुराती  माँ  की   बिंदिया...  ...
मेरे माथे  को सहलाती...
 माँ की   अंगुलियां.........
बहुत सुहाती थी ..
थके कंधे पर ..
अब भी  महसूस होता है..
 बचपन को  बेगार   करते ..
उस भारी बस्ते का  बोझ..

और विश्वास में  उनके...  

तब तक..हिलते 
दो जोड़ी हाथ..
जब तक  मेरी भोली आस्थाएं ..
स्कूल की  सीडियां
 न  लांघ  जाती थी ..
उन सीडियों  से ...
 इस ड्योढ़ी  तक ...

पहुँचते पहुँचते.......

 मेरा अस्तित्व
मेरी ज्ञानेन्द्रियों के .
 अथक  प्रयत्न के बाद भी
 ब्यवस्थाओं की बैसाखी  थामे
 तुम्हारे  अस्तित्व से कोसो दूर है ... 
अब थके हारे मेरे .. 
सारे युवा स्वप्नों के भग्नावेश
पिता के पीले उदास   चेहरे  की...
 झुर्रियों में  अंकित हो गए हैं ..
विकास  के इस क्रम  में ???
वो दिन के बुढाए ..
 शाम  का सूरज से  हो गए हैं  ..
आस्थाओं की  डोर ...
 भरभरा कर  टूट गयी  है ....
उनकी स्याह   आँखों... से ...
 बहता है निरंतर...

 एक विवश आक्रोश ...

अब नहीं बुनती  हैं वो 
सपनो के  सुनहरे तार ..

सोचता हूँ क्या ढूँढ सकूंगा ??

उनकी  आँखों  में विलुप्त ...
उन असंख्य  महासागरों को ..

क्योंकि...

मुझे  अब भी याद है....

बचपन कि वो सुबह.....

जब पिता के साथ......



श्रीप्रकाश  डिमरी  देहरादून  उत्तराखंड  १९८४
मेरी  डायरी के अंश  

Saturday, May 19, 2012

विवशता

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नहीं याद कि ..
कब की बात है
उस दिन ...
अम्मा ने थामा था
मेरा हाथ ..
और सपनों की  तरह टूटे
एक स्कूल के सामने ..
ठेकेदार से कराया था
मेरा साक्षात्कार
और मिल गयी ..
विवस ...
विरासत मुझे ....
भाग्य की लकीरों
को पत्थर की तरह
समय  की  हथौड़ी से निरंतर
तोड़ने  ......
और भेड़ियों भरे जंगल में
फटे चिथड़ों में जवान होने की ...
उस दिन ...
एकायक लगा ....
किस्मत हो गयी मेहरबान ..
जब एक ....
टिन के पत्तर से बने...
घर नुमा आकृति में
मैं हो गयी दाखिल ...
लगा कि ...
पिया संग मिल गयी
मुझे मेरी मंजिल.......
पर सपनो के वहाँ भी
हो गए तार तार ....
अब दिन भर खून को
पसीने में बेचकर लायी ...
भीगी कागज़ सी ( )
मेरी सहमी हुई भूख को
शराब में डूबा सांप ....
हर रोज डस जाता है ..
रात भर फुफकारता ..
बच्चों को जगा कर
सुबह खुद सो जाता है
मेरी बेबसी पर ..
बेरहम चाँद भी ...
बेशर्मी से मुस्कुराता है ...
और तपती दोपहरिया में ..
सूरज भी मुह चिडाता है ..
मुझे ..
अब नहीं लुभाते..
स्कूल जाते...
माता पिता का ...
दुलार पाते बच्चे ...,
सफ़ेद पोश किसी गुड्डे के
मजदूर दिवस जिंदाबाद के नारे
या रेशम की साडी में लिपटी ..
किसी गुडिया के ..
महिला ससक्तिकरण के मीठे बोल ..
कंक्रीट के ढेर से ऊँचे
उम्र के इस पड़ाव पर भी
मेरे तनहा तनहा से..
इस अंतहीन श्रम को ..
कतई ...नहीं देना है विराम ...
निरंतर.. ठक..ठक ..ठक ..ठक ..
समय  की  हथौड़ी से ..
करते जाना है अविराम ...
.............................
भाग्य  की  लकीरों
को पत्थर की  तरह
पीटने का काम ......
 
स्वरचित .....श्रीप्रकाश डिमरी
श्रीनगर /आम्र कुञ्ज उत्तराखंड २९ मई २०१०
अक्सर अपने आस पास ये सब दिखाई देता है..जब मैं विद्यार्थी था..तब अपने घर के पीछे एक नव निर्माणाधीन कॉलोनी में ऐसी ही एक महिला श्रमिक से सामना हुआ था जिसका पति उसकी दिन भर की मेहनत के पैसे शराब में उड़ा देता था मारता पीटता था......कैसी विडम्बना है.... कई वर्षों बाद ऐसा ही कुछ दिखाई दिया .स्मृति पटल में कैद मनोभाव आकार लेने लगे चंद पंक्तियाँ बनकर छलक आये .....

Sunday, November 27, 2011

सांझ !!!!.....

image    
       सांझ !!!!.....
सांवली सूरत मोहनी मूरत
स्वर्ण रथ पर बैठी
पश्चिम पथ पर जाती
विहगों को हर्षाती
कलरव गीत गवाती
नीड़ों में लौटाती ......
..............................................
दूर क्षितिज के संधि पट पर
नीलित नभ के सुकुमार मुख पर
नित नटखट अल्हड बाला सी
लाल गुलाल मल कर छिप जाती
................................................
और कहीं दीपों के कोमल उर में
मुस्कानों के पीत पुष्प खिलाती
वन उपवन धरा के छोर को
अपने श्यामल आँचल में छुपाती
....................................................
कहो प्रिये !!!
फिर कब आओगी ???
कजरारी आँखों से...
मंद मंद मुस्काती ...
थके पथिक को लुभाती ..
आलौकिक मंगल गीत गाती ...


श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ उत्तराँचल  भारत २०१०
हे प्रभु !!जीवन  के  सुहाने  दिवस  के  बाद सांझ  भी उतनी ही  सुन्दर सलोनी हो !!!