Monday, October 11, 2010

प्रतीक्षा ....!!!!!


मेरी स्मृतियों के...

उस गोल चक्कर के पास...

अब भी जलती है होली ..

और..

ढोल की थाप पर ...

रात भर नाचते हैं ...

भूले बिसरे ...

अल्हड युवा स्वप्न...

और अलाव के पास....

अब भी ..

उंघती आँखें ..

रात भर...

.. बतियाती ..

अनायास...

यूँ ही हँसती हैं ..

और फिर...

हर सुबह....

तुम चुपचाप...

दबे पाँव ..

पीछे से आती...

खिलखिलाती ...

टेसू के रंगों सी..

स्नेह से सरोबार कर जाती हो ..

और दर्पित मैं...

यूँ ही भागता हूँ ...

तुम्हे छूने को ...

पर कभी नहीं छू सका में ...

आह प्रिये !!!

इस विराम संधि पर...

गालों पर मले गुलाल....

लाजवंती मुस्कान लिए....

मेरे ह्रदय द्वार पर ...

क्यों ..???
अब तक ...

ठिठकी सी ..

खड़ी हो तुम ..

और मैं..

बेदम चुपचाप ..

थका थका सा ..

टकटकी लगाये ..

अपलक ..

देखता हूँ उस देहरी को ..

जहाँ से...

पत्थरों के इस शहर में..

मुझे ...

एक निर्जीव पुतला समझ..

गुजरे वक्त की तरह ..

कभी लौट कर...

नहीं आई तुम...

काश !!! एक बार ...

सिर्फ एक बार ...

लौट कर मेरी आँखों में...

झाँक कर तो देखा होता...

श्रीप्रकाश डिमरी... जोशीमठ ..५ -९-२०१०....

Thursday, April 22, 2010

सिन्दूरी शाम






सिंदूरी  शाम ........
उस निश्तब्ध.....
अंधकार में......
पलाश वृक्षों तले
फुसफुसाते हुए..........
अपनी जादुई आवाज़ में
तुमने मुझसे पूछा था........
में कौन हूँ ?
निरुत्तर में..........
मेरा अस्तित्व भी ..........
सिर्फ एक मंथर गति...........
जीवन का सर्वनाम ...
कदापि नहीं है ........
क्यूंकि ...........
मुझे समेटना है ............
उस आभा को ...........
और तय करना है
एक सफ़र .....
अविराम .......
जीवन की सार्थकता का ....
उस सिंदूरी शाम तक .....
स्वरचित .... श्रीप्रकाश डिमरी.1983.

Alas!!... May I reconcile?

Alas!!... May I reconcile?

Passing through ….
The snowy woods..
Towards..
My loving school of dreams...
I still remember……
Those everlasting …..
Memories of my school......
how tranquil is me ???………
The.. School corridor...
without u all my dears...
please do.. Remember me
once again....
the feeling of love…..
Happiness and separations
Shared together……
With so many little hearts
And our beloved ……
Respected. Teachers...
Sharing me…. A… kid
With dad and mom……
for ever…
Alas!!!! May I reconcile…..
With you all ?
No…. no ……never …...Never
Oh!! Gone are the days…
Forever….

 (Dedicated to my departed beloved mother )

महा प्रयाण !!!






प्रिये !!!!
मैं.......
ओस की एक नन्ही बूंद
घने अँधेरे हिम शीतित वन में
एक पत्ती पर अर्ध चंद्राकर
ठिठुरता सहमता
उष्णता की प्रत्याशा में
युगों युगों तक करता रहा
तुम्हारा इंतजार...
और तुम धीरे धीरे
मुझे सहलाती
एक सूर्य रश्मि !!!!
बनकर उष्णता .....
छा गयी मुझपर
मैं सहज हो उठा
और हो गया एकाकार
तुमसे........
प्रिये !!!!
तुम एक बसंत
और मैं एक
रुखी सूखी काया
छा गयी तुम मुझपर
बनकर हरित सौंदर्य
खिल उठा मैं तुम्हे पाकर ...
निहारता रहा
तुम्हारा अप्रतिम सौंदर्य
अपलक .......
पर
ये कौन है ???
जो चीर रहा है
मेरे सीने को
रौंद रहा है
हरित सौंदर्य को
बो रहा
कंक्रीट के उपवन
घोट रहा
कोयल की कूक
उढ़ रहा
आकाश में
रोक रहा
सूर्य चन्द्र रश्मि को
खेल रहा
विनाशक गोलों से
रच रहाषडयंत्र
तुम्हारे मेरे
अंतहीन विछोह का .....
प्रिये !!!!
आज भयग्रस्त कातर हो रहा हूँ मैं ..
क्योंकि तुम्हारी निकटता ने
बना दिया है मुझे कोमल
बहुत कोमल है ह्रदय मेरा
और पीत पात से मेरे हाथ
इसलिए
महा विनाश के उस आर्तनाद में
नारंगी सूरज के
घटाटोप अंधकार में डूबकर मेरे
तुमसे ....
सदा बिछुढ़ जाने से पहले
मेरी प्रियतम !!!
उबार लेना मुझे
नहीं तो में नन्हा तिनका बनके उढ़ जाऊंगा
और फिर ...
कभी लौट कर
तुम तक नहीं आ पाउँगा .....
स्वरचित ...श्रीप्रकाश डिमरी ...९-११-२००९

माँ... ओ !! मेरी माँ ..


मेरे बचपन की साथी
अंगुली पकड़ चलाती
वाणी मुझे सिखाती ...
प्राण दीप की बाती..
सुख दुःख की साथी
माँ !!! कहाँ हो तुम...???
मैं मुस्कुराता ..
बसंत सी खिल जाती
मैं रोता ..
सर्द स्याह...
रात सी हो जाती ...
तेरा आँचल ..
ममतामयी छाया ...
ऐसी तेरी मोहिनी माया ..
एक पल का बिछोह ...
तुम से न सह पाया ...
तुझसे ही तो.....
तो बालपन पाया
नहीं तू तो ..
मैं बुड़ाया...
बनी डूबता सूरज ....
मेरी काया ..
तुझे पुकारूँ ..
माँ ...ओ !!!.. मेरी माँ..
मेरे लिए...
माँ ... सिर्फ संबोधन ...
क्या प्रत्युत्तर नहीं ....??
अगर है ऐसा तो ..
क्यों सपनो में आती हो ..???
मेरे माथे को सहलाकर
फुर्र से उड़ जाती हो ...
तुम कहती थी रोना नहीं ..
इसलिए नम आँखों में..
कैद करली हैं ..
अनगिनत हिचकियाँ ...
काश !!! कि फिर ये हो पाता ..
बच्चा बनकर तुझसे लिपट जाता ..
लुक्का छिप्पी
कहते तेरे
आँचल में छिप जाता ....
मुझे कोई तो समझाता ...
मेरे मन रोना नहीं ...
ये तो आत्मा का अहसास है ..
माँ... सदा मेरे पास है ....
स्वरचित ...श्रीप्रकाश डिमरी अप्रैल ५,२०१०

नव यौवन ...

फ़रवरी२०१० हरिद्वार कुम्भ  मेले में  गंगा जी  के तट  मेरे ( श्रीप्रकाश  डिमरी)  द्वारा स्वयं  खींची  गयी  तस्वीर
उड़ रहा था
उन्मुक्त मैं नील गगन मे..
भरता था जहाँ यौवन रस ..
स्वर्ण कलश मेरे तन मे ..
आह !!! प्रिये !!!
तुम दीप लिए ..
.सांझ सकारे
आन खड़ी हो ...
मेरे द्वारे ..
आओ आओ
नव यौवन दाता ....
मेरे उर को
चिर आनंद से ..
हर्षित कर जाओ
स्वागतम  स्वागतम !!
प्रतीक्षारत था मैं तुन्हारी
मेरी अनन्य प्रियतम.....
जहाँ कभी.....
बिछुड़ा था तुमसे
साथ चलूँगा मुस्कुराते
थामे हाथ तुम्हारा ...
प्रेम गीत गाते....
उस अनंत शुभ्र तम में ..
जहाँ खिलेंगे...
किसलय और नव पुष्प ...
आओ  प्रिये  !!! ....
चलें  उसी  पार .....
भूले   बिसरे...
अपने....
  शाश्वत  और ...
सुन्दर से उपवन में .........
........स्वरचित श्रीप्रकाश डिमरी १५ अप्रैल २०१०
प्रकृति के सुकुमार चितेरे कवि श्री चंद्रकुंवर सिंह बर्त्वाल( १९१९ -१९४७ )
को समर्पित ....