Sunday, February 1, 2015

गुमसुम चांदनी

यकीं  है
ये  आगाज है 
अंजाम  नहीं
कारवाँ
नहीं थमेगा अभी
कई मंजिलें
और भी हैं
राहे गुजर में
................
जिंदगी के आईने में
कर लेंगे हिसाब किताब
पलकों पे ठिटके   
उन आंसुओं का
 ................... 
यकीं ही नहीं होता  
कि पत्थरों के इस  शहर में
मसीहा  कोई
तुमसा भी मिले  
......................................
अपने रंजो गम को
तारीख बनाने वालों
काश कल रात को
मर  गए  चाँद के कफ़न को
तुमने  देखा होता
........................................
गुजारिश  है तुझसे
खामोश हो जा
ऐ चांदनी…….
यहाँ  की
दस्तूरे  जिंदगी  में
सिसकना  मना  है ......

श्रीप्रकाश डिमरी १७ सितम्बर २०१४ 


5 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सुन्दर काव्य रचना

अल्पना वर्मा said...

चाँदनी के गुमसुम होने का राज़ आखिरी दो क्षणिकाओं में मिला.. 'मर गए चाँद के कफ़न को तुमने देखा होता!!!बहुत खूब!!

कहकशां खान said...

बेहतरीन रचना।

GathaEditor Onlinegatha said...

Start self publishing with leading digital publishing company and start selling more copies
Publish ebook with ISBN, Print on Demand

GathaEditor Onlinegatha said...

Start self publishing with leading digital publishing company and start selling more copies
Publish ebook with ISBN, Print on Demand