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तुमसा भी मिले
अपने रंजो गम को
गुजारिश है तुझसे
श्रीप्रकाश डिमरी १७ सितम्बर २०१४
.अपने आस पास मानवीय संवेदनाओं ..आस्थाओं के सरल ओर सहज रूप को ..अविश्वाश ओर दंभ से परास्त होते देखना कितना पीड़ा दायक होता है ... हमारी संवेदनाये ओर स्नेह इस भौतिक युग में सभ्यता के तथाकथित विकास में .. कितना बिखर चुके हैं ....मन भर आता है..ओर अनुभूतियाँ स्पन्दित होने लगती हैं.. .. अवाक रह जाता हूँ मैं....फिर भी विश्वास है .. संसार में मानवीय संवेदनाएं एवं पारस्परिक प्रेम की भावना के जीवंत होने का....
इस घर के हर कोने में
बसी हैं यादें कितनी
इसलिए यहाँ जाना
और जाके भूल पाना
बेहद मुश्किल है ......
माँ के जाने के बाद
पिता ने मान ली है हार
हर वक्त यहाँ खोयी खोयी सी
तन्हाई पसरी है ......
ना जाने कब का सो चूका है
बिन बाती का दीप
जहाँ माँ मुस्कुराती थी
वो तुलसी उदास सी खड़ी है.....
सूखी मरुस्थल सी
रंगोली सिसकती है
गाहे बाहे कहीं आवाज सी उभरती है
शाम हो गयी अब घर आजा लाल
बचपन की भूली बिसरी याद बिसूरती है ...........
श्रीप्रकाश डिमरी जोशीमठ उत्तराखंड
नवम्बर २६ २०१२
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| देहरादून/ दून घाटी मुसूरी मार्ग से मेरे द्वारा खींची गयी तस्वीर |